चुनाव होंगे और खत्म हो जाएंगे लेकिन आपसी सद्भावना सौहार्द और भाईचारे पर नहीं आनी चाहिए आंच

एक बार फिर लोकसभा चुनाव आ चुके हैं जोर शोर के साथ तैयारियां चल रही हैं हर राजनीतिक दल अपने झंडे के साथ काम कर रहा है हार जीत के आंकड़े बिठाए जा रहे हैं धरमगढ़ राजनीति का सहारा तो कहीं जात पात का खेल तो कहीं गूंजते हुए एनैतिक नारे आप को दिग्भ्रमित करने का काम करेंगे लेकिन जनता जनार्दन है उसको चुनाव के समय में बहुत ही संयम धैर्य एवं सूज बूझ के परिचय के साथ मतदान प्रक्रिया में भाग लेना चाहिए आवेश में आकर या फिर नेताओं के बहकावे में आकर कभी भी शिकार नहीं होना चाहिए नेता ५ साल में कुछ ही दिन गलियों में फिर कर फिर ५ साल धक्के खाने के लिए जनता को मजबूर और बेबस करते हैं यदि ऐसे में भी जनता अपने विवेक का परिचय देते हुए सही प्रत्याशी का चयन नहीं करती है तो यह दोष जनता का है साथ ही धर्मवाद जातिवाद से निकलकर शांति सद्भावना और सौहार्द के आधार पर अच्छे प्रतियासी का चयन करें और देखे कि वह विकास कराने में सक्षम नजर आता हैं कि नही समाज मे भाईचारे एवं संदेश को फैलाने में कहां तक सक्षम है या फिर कट्टरता और संप्रदायिकता का रंग दिखा कर चुनावी बिसात में बाजी मार ले जाना चाहता हैं हिंदू मुस्लिम और नफरत के आधार पर जनता ना बटे उसको यही रहना है आपस में एक दूसरे के काम आना है साथ ही सहभागिता के आधार पर समाज में सामंजस्य बना कर चलना है ऐसे में सूझ बूझ एवं परिपकता का परिचय देते हुए चुनावी प्रतियासी को चुने केई बार देखने मे आता हैं कि चुनाव के दौरान कुछ प्रत्याशी गंदे बोल एवं भड़काऊ राजनीति करके जनता को उल्लू बना कर अपनी नय्या साधना चाहते हैं इस लिए सारा दारोमदार जनता के सुविवेक पर ही निर्भर करता है विवेक संयम धैर्य से काम लेते हुए चुनाव में अपने आसपास अराजक तत्वों पर कड़ी नजर रखें किसी के बहकावे में ना आएं तथा सांप्रदायिक गतिविधियों का डटकर विरोध करें चाहे वह किसी भी समाज की तरफ से हो रही हो यही सूझ बूझ और समझदारी साफ सुथरे और पारदर्शी चुनाव कराने में सहायक सिद्ध होती है।

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